आपराधिक न्यायशास्त्र का मकसद चरित्र में सुधार करना : सुप्रीम कोर्ट 

इंडिया न्यूज, नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498ए (दहेज प्रताड़ना) के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को दी गई सजा को कम कर दिया है। व्यक्ति के अपनी दूसरी पत्नी और बच्चों को मुआवजा देने के लिए तैयार होने के बाद कोर्ट ने उसकी सजा माफ की। पीठ ने कहा कि किसी भी आपराधिक न्यायशास्त्र का उद्देश्य चरित्र में सुधार करना है। कोर्ट के आदेश के अनुसार जमानत के बाद व्यक्ति पीड़ित की देखभाल करेगा। शीर्ष अदालत ने कहा, यदि व्यक्ति पत्नी को देखभाल भत्ता और एकमुश्त मुआवजा दे रहा है तो हम उसे इसकी इजाजत देते हैं। वहीं पत्नी भी तीन लाख रुपए  का मुआवजा लेने के लिए तैयार है। कोर्ट ने आदेश दिया कि झारखंड में पाकुड़ ट्रायल कोर्ट से छह माह के अंदर मुआवजा देने के बाद दोषी समीउल को  उसके जेल में रहने की अवधि को सजा मानकर रिहा कर दिया जाए। कोर्ट ने यह मुआवजा सीआरपीसी की धारा 357 के तहत दिलवाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि वह मुआवजा और भत्ता नहीं देता है तो वह बची हुई सजा काटेगा। कोर्ट ने कहा कि दो लाख रुपए पत्नी को और 50-50 हजार रुपए बच्चों के नाम एफडी करने का आदेश दिया है जो उन्हें 21 वर्ष का होने पर भुगतान की जाएगी। हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष समीउल ने कहा कि वह पत्नी और बच्चों को तीन लाख रुपए का मुआवजा देने को तैयार है लेकिन धन जुटाने के लिए लगभग छह महीने का समय चाहिए।
हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी अपील  
दोषी समीउल की दूसरी पत्नी हीना बीबी ने आईपीसी की धारा 498ए के तहत मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना व दहेज की मांग का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। ट्रायल कोर्ट ने समीउल को दोषी ठहराया और 10,000 रुपए के जुर्माने के साथ तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। अपील कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी और बाद में उसकी पुनरीक्षण याचिका भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी।
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