हरियाणा में मिला मंकीपॉक्स का पहला संदिग्ध केस

इंडिया न्यूज, Haryana News (Monkeypox in Haryana): केरल और दिल्ली के बाद अब मंकीपॉक्स हरियाणा में भी दस्तक देता नजर आया है। जी हां यहा के जिला सोनीपत में मंकीपॉक्स का एक संदिग्ध मरीज सामने आया है जिससे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है।

मरीज सिविल अस्पताल में दाखिल

मालूम हुआ है कि आज जो संदिग्ध मरीज मिला है वह मूल रूप से केरल का रहने वाला है और यहां जिंदल ग्लोबर सिटी में रहता है और यहा यूनिवर्सिटी में पढ़ाता है। कल देर शाम ही केरल से दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा था और तदोपरांत हरियाणा के जिला सोनीपत में आया।

सोनीपत पहुंचते ही उक्त व्यक्ति की हालत खराब होने लगी, जिस कारण उसे तुरंत सिविल अस्पताल पहुंचाया गया जहां डॉक्टरों ने मंकीपॉक्स के लक्षण मिलने पर तुरंत सैंपल को जांच के लिए भेज दिया है। फिलहाल अस्पताल में चिकित्सकों ने आईसोलेशन वार्ड में भर्ती कर दिया है।

कैसे फैल रहा मंकीपॉक्स  

आपको जानकारी दे दें कि मंकीपॉक्स एक ऐसा संक्रामक रोग है, जो संक्रमित स्थानों पर जाने या संक्रमित के संपर्क में आने के कारण फैलता है। सीडीसी की रिपोर्ट के मानें तो उक्त वायरस जानवरों से इंसानों में आया है। अध्ययन में यह भी पता चला कि करीब 95% लोग यौन संबंधों के दौरान एक-दूसरे से संक्रमित हुए हैं।

मंकीपॉक्स के लक्षण

रिपोर्ट के मुताबिक इस वायरस की चपेट में आए व्यक्तियों में बुखार, सुस्ती, मायलागिया सिरदर्द और लिम्फ नोड्स की सूजन इत्यादि के लक्षण पाए जाते हैं। इस वायरस का प्रकोप अमूमन 2-4 सप्ताह तक रह सकता है। लेकिन कई बार यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण भी बन सकते हैं। वहीं आपको बता दें कि चेहरे और हाथ-पांव पर बड़े दाने पड़ना मंकीपॉक्स के मुख्य लक्षणों में से एक है।

इन देशों में मंकीपॉक्स के केस ज्यादा मिले?

यूके, स्पेन, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, पुर्तगाल, कनाडा, नीदरलैंड, इटली और बेल्जियम में मंकीपॉक्स के ज्यादातर मामले देखने को मिले हैं।

डब्ल्यूएचओ के वर्ल्ड हेल्थ इमरजेंसी का मतलब क्या?

डब्ल्यूएचओ जैसे ही किसी बीमारी को वर्ल्ड हेल्थ इमरजेंसी घोषित करती है, तो इसका मतलब होता है कि वह बीमारी तेजी से दुनिया भर में फैल रही है। ऐसे में भारत में इसकी दस्तक चिंताजनक है। अब भारत या दूसरे देशों के सरकार को इस बीमारी को रोकने के लिए 3 स्टेप में फैसले लेने होंगे।

पहला, बीमारी को फैलने से रोकने के लिए प्रोटोकॉल और कड़ी गाइडलाइ बनाना। दूसरा, लोगों को जागरूक करते हुए बनाई गई गाइडलाइन को कड़ाई से लागू करना। तीसरा, संक्रमित मरीजों की पहचान कर उनका इलाज करना।

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