माता सीता के बिना अधूरे है, भगवान श्री राम

इंडिया न्यूज, नई दिल्ली :
प्राचीन काल में ऐसी कई महिलाएं हुई हैं जिन्हें हम आदर्श और उत्तम चरित्र की महिलाएं मानते हैं। जो भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। उनमें से सर्वोत्तम हैं माता सीता। जैसे Sriram को पुरुषों में उत्तम पुरुषोत्तम कहा गया है, उसी तरह माता सीता भी महिलाओं में सबसे उत्तम एवं आदर्श नारी चरित्र हैं। धर्मशास्त्रों में ऐसी ही अनेक गृहस्थ और पतिव्रता स्त्रियों के बारे में लिखा गया है, जो आज भी हर नारी के लिए आदर्श और प्रेरणा हैं। अनेक लोग Mother Sita के जीवन को संघर्ष से भरा भी मानते हैं, लेकिन असल में उनके इसी संघर्षमय जीवन में आधुनिक हर कामकाजी या गृहस्थ स्त्री के लिए बेहतर, उत्तम और संतुलित जीवन के अनमोल सूत्र समाये हैं। उनकी सत्य निष्ठा, चरित्र निष्ठा, सिद्धांत निष्ठा और अध्यात्म निष्ठा अद्भुत एवं प्रेरक है। वे त्याग, तपस्या, तितिक्षा, तेजस्विता, बौद्धिकता, एवं पतिव्रता धर्म की प्रतीक हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार king janak अकाल एवं सूखे की विकराल स्थिति को देखते हुए स्वयं ही एक बार हल से खेत जोत रहे थे। तभी उनका हल किसी चीज से टकराया, तब राजा जनक ने देखा तो वहां एक कलश प्राप्त हुआ। उस कलश में एक सुंदर कन्या थी। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, वह इस कन्या को अपने साथ लें आएं। जोती हुई भूमि तथा हल के नोक को भी सीता कहा जाता है। इसलिए बालिका का नाम सीता रखा गया था। फाल्गुण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को Sita धरती से प्रकट हुई। राजा जनक की सबसे बड़ी पु़त्री होने के कारण माता सीता ने अपने सम्पूर्ण जीवन काल में विवेक, प्रेम, त्याग, समर्पण एवं सत्य को केन्द्रिय भाव बनाया।

माता सीता का विलक्षण व्यक्तित्व यूं लगता मानो पवित्रता स्वयं धरती पर उतर आयी हो। उनके आदर्श समय के साथ-साथ प्रकट होते रहे, उद्देश्य गतिशील रहे, सिद्धांत आचरण बनते थे और संकल्प साध्य तक पहुंचते थे। यदि मन में श्रेष्ठ के चयन की दृढ़ इच्छा हो तो निश्चित ही ऐसा ही होता है। सीता स्वयंवर तो सिर्फ एक नाटक था। असल में सीता ने श्रीराम और श्रीराम ने सीता को पहले ही चुन लिया था। मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को Lord Shri Ram तथा जनकपुत्री जानकी का विवाह हुआ था, तभी से इस पंचमी को विवाह पंचमी पर्व के रूप में मनाया जाता है।

यह बहुत ही आश्चर्य है कि वनवास श्रीराम को मिला लेकिन माता सीता भी उनके साथ महलों के सारे सुख, धन और वैभव को छोड़कर चल दीं। सिर्फ इसलिए कि उन्हें अपने Paternalistic Religion को निभाना था। उस काल में वन बहुत ही भयानक हुआ करता था। वहां रहना भी बहुत कठिन था लेकिन माता सीता ने श्रीराम के साथ ही रहना स्वीकार किया। निश्चित ही पति को अपनी पत्नी के हर कदम पर साथ देना जरूरी है, उसी तरह पत्नी का भी उसके पति के हर सुख और दुख में साथ देना जरूरी है। कोई महिला यदि अपने पति के दुख में दुखी और सुखी में सुखी नहीं होती है, तो उसे सोचना चाहिए कि वह क्या है। आदर्श और उत्तम दांपत्य जीवन शिव-पार्वती और राम-सीता की तरह ही हो सकता है।

माता सीता सिर्फ गृहिणी ही नहीं थीं अर्थात घर में रहकर रोटी बनाना या घर के ही कामकाज देखना। वे प्रभु श्रीराम के हर कार्य में हाथ बंटाती थीं, जहां Sriram के कारण उनकी पूर्णता थी, वहीं Sriram भी माता सीता के कारण ही पूर्ण होते हैं। श्रीराम जहां रुकते थे, वहां वे तीन लोगों के रहने के लिए एक कुटिया बनाते, खुद के कपड़े धोते, जलाने की लकड़ियां इकट्ठी करते और खाने के लिए कंद-मूल तोड़ते थे। सभी कार्यों में लक्ष्मण सहित माता सीता उनका साथ देती थीं। माता सीता का जब रावण ने अपहरण कर लिया और उन्हें Ashok Vatika में रखा तब इस कठिन परिस्थिति में उन्होंने शील, सहनशीलता, साहस और धर्म का पालन किया। इस दौरान रावण ने उन्हें साम, दाम, दंड और भेद की नीति से अपनी ओर झुकाने, लुभाने एवं प्रभावित करने का प्रयास किया लेकिन माता सीता नहीं झुकीं, क्योंकि उनको रावण की ताकत और वैभव के आगे अपने पति श्रीराम और उनकी शक्ति के प्रति पूरा विश्वास था।

Sriram के वियोग में दु:खी, पीड़ित माता सीता को देखकर Hanuman ji भी बेचैन हो गये और अपनी शक्ति को दिखाकर मां सीता को आश्वस्त किया कि वे तत्क्षण उन्हें श्रीराम के पास ले जा सकते हैं। लेकिन सीताजी ने कहा कि श्रीराम के प्रति मेरा जो समर्पण है, जो संपूर्ण त्याग है, मेरा पतिव्रता का धर्म है, उसको ध्यान में रखकर मैं श्रीराम के अतिरिक्त किसी अन्य का स्पर्श नहीं कर सकती। अब श्रीराम यहां स्वयं आएं, रावण का वध करें। रामजी ही मुझे मान-मयार्दा के साथ लेकर जाएं, यही उचित होगा।

रावण के लोभ ने पहली बार सीता को श्रीराम से अलग किया। दूसरी बार अयोध्या के लोगों की सामान्य सोच एवं ना समझी ने श्रीराम से माता को विलग कराया। लेकिन माता कहां अलग हो पायी। सदैव श्रीराम के साथ और श्रीराम के पूर्व ही स्वर और शब्दों में रहीं। कहते हैं कि Bhagwati Parvati ने Shiva से निवेदन किया कि वह कोई ऐसी कथा सुनाये, जो हर प्रकार के दुख और क्लेश में संतुष्टि की प्रेरणा प्रदान करें एवं जीवन को पूर्णता की ओर अग्रसर करे। तब पहली बार इस धरती पर भगवान भोलेशंकर ने माता पार्वती को सीताराम की कथा सुनाई। जीवन के उतार-चढ़ावों, संकटों, झंझावातों और असंतोष में केवल श्रीराम एवं सीता का दाम्पत्य ही शाश्वत शांति और संतोष प्रदान करता है। उनका जीवन कर्म और ज्ञान के बीच के समन्वय का उदाहरण बनकर प्रेम और चरित्र की एक अनुपम मयार्दा स्थापित करता है। यही कारण है Indian Society में माता सीता के माध्यम से जिन आदर्शों की कल्पना की गई है, वे भारतीयों को आज भी उतनी ही श्रद्धा से स्वीकार हैं।

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